High Quality
Lorem ipsum dolor sit amet, has ei ipsum scaevola deseruisse am sea facilisis.
Learn More+91 9451512113
गोरखपुर सोशल साइंटिस्ट शोध पत्रिका की आरम्भ स्वर्गीय प्रो. अशोक सक्सेना की प्रेरणा और नेतृत्व में अकादमिक क्षेत्र में गंभीर शोध को बढ़ावा देने उसे प्रोत्साहित करने और जन्मोन्मुखी बनाने के लिए की गई. हम गौरवान्वित हैं की हम अपने उद्देश्य में पूर्णतया सफल रहे हैं. अकादमिक तटस्थता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, प्रासंगिकता और सामाजिक उपभोगिता को समर्पित विकासमान है.
यह पत्रिका लम्बे समय से गंभीर शोधार्थियों के बीच लोकप्रिय रही है। इसका उद्देश्य अपने समय में अकादमिक मानक को बनाये रखने में मदद देने के साथ - साथ गुणवत्तापूर्ण मानवीय संसाधन तैयार करना है। व्यावसायिकता और उपभोगतावादी संस्कृति से प्रतिरोघ करते हुआ यह समाज के पक्ष में अकादमिक जगत के ज्ञान और संवेदना का इस्तेमाल करने का उद्देश्य रखता है।
गोरखपुर सोशल साइंटिस्ट मानविकी, समाज विज्ञान तथा साहित्य की अर्धवार्षिक रेफ्रीड पूर्व समीक्षित अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका है। इसे सन 2010 ईस्वी में प्रोफेसर अशोक सक्सेना तथा प्रोफेसर चंद्र भूषण गुप्ता 'अंकुर' द्वारा आरंभ किया गया था। पूर्णतया अकादमिक शोध, उसके प्रसार तथा संरक्षण पर केंद्रित यह शोध पत्रिका द्विभाषी है। यह पत्रिका भारतीय संविधान द्वारा स्वीकृत अधिकारों, कर्तव्य तथा सीमाओं के भीतर प्रकाशित जा रही है। हम संविधान के प्रति अपनी संदेह रहित निष्ठा घोषित करते हैं। इसके प्रकाशक प्रबंधन और प्रचार से जुड़े सभी लोग भारतीय नागरिक हैं।
गोरखपुर सोशल साइंटिस्ट पत्रिका मौलिक, जनोपयोगी, मानकीय एवं जनोन्मुखी शोध को स्थान देने का विशेष प्रयास करती है। यह पत्रिका ना लाभ न हानि के सिद्धांत पर संचालित होती है। समाज के वंचित, परिधि पर सक्रिय एवं अलाभकारी स्थिति में रहकर उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे शोधार्थियों, प्राध्यापकों, अनुसन्धान कर्ताओं, छात्र-छात्राओं तथा ग्रामीण इलाके में रहने वाले अकादमिक अभिरुचि के लोगों को स्थान देकर पत्रिका गौरवान्वित होती है। हम लोकतंत्र के प्रति पूर्ण समर्पण की घोषणा करते हैं।
Lorem ipsum dolor sit amet, has ei ipsum scaevola deseruisse am sea facilisis.
Learn MoreLorem ipsum dolor sit amet, has ei ipsum scaevola deseruisse am sea facilisis.
Learn MoreLorem ipsum dolor sit amet, has ei ipsum scaevola deseruisse am sea facilisis.
Learn More